एक आस थी यारा की अपने परिवार से मिलने की भूखे रहे लेंगे पर कम से कम अपने परिवार के पास तो रहेंगे तभी तो निकाल पड़े चिलचिलाती धूप में न सिर पर छाओ थी न बहुत सो के पैर में चप्पल पर फिर भी निकाल पड़े सैकड़ों मिलो के सफर पर अपने छोटे - छोटे नन्ने परिंदो के साथ न जाने कितनो ने अपनी जान गवाई और न जाने कितने भूख पियास से तड़प कर खुदा को पियारे हो गए कितनों के परिवार वीराने हो गए पर यहां किसको फिकर थी उन मजदूरों की यारा ये तो राजनीति है यारा यहां सिर्फ पैसे की चलती है जिनको देश की मिट्टी से नफरत थी उन्हीं को उड़ानों से देश की मिट्टी पर उतारा जा रहा है ओर जो देश के लिए दिन रात अपने को तपती धूप ओर कड़ाके की सर्दी में इस देश की मिट्टी के लिए लड़े जो मजदूर उन्हीं को सफर के लिए कुछ नहीं मिला..."ये है यारा तेरा देश जिसे तू सुधारना चाहती है"
"वाहा रे खुदा वाहा रे तेरी खुदाई जो सिर्फ ओर सिर्फ इक मजदूर की सामत आई"
रोता है दिल मेरा पर किसे बताऊं यहां तो सारे ही इंसान के लिबास में जानवर है यारा जिसे देखो वो भूखे भेड़िए की तरह एक दूसरे को खाने को दौड़ रहा है.....😔😔
Writing By Vivan Manva Sultan 2213...🖋️🤗
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